Badaun News: बदायूं में चुनावी बिसात, भाजपा की ग्राउंड स्ट्राइक बनाम सपा का जातीय अभेद्य किला


बदायूं राजनीति संवाददाता। शिखर संवाद 

Badaun News : बदायूं के सियासी गलियारों में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो गई है। जहां भारतीय जनता पार्टी गांव-बस्ती चलो अभियान के जरिए सत्ता की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचा रही है, वहीं विपक्ष फिलहाल आरोप-प्रत्यारोप के चक्रव्यूह में उलझा नजर आ रहा है। नई जिला कार्यकारिणी की घोषणा के साथ भाजपा ने चुनावी रणभेरी फूंक दी है। धरातल पर भगवा खेमे की सक्रियता और संगठन की मजबूती ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है, जिससे चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है।

बदायूं की राजनीति हमेशा से ही प्रदेश की सत्ता का रुख तय करने वाली रही है। वर्तमान परिदृश्य में भाजपा की रणनीति बेहद आक्रामक और संगठनात्मक है। पार्टी ने न केवल अपनी नई कार्यकारिणी के माध्यम से कार्यकर्ताओं में जोश भरा है, बल्कि अंतिम पायदान के व्यक्ति तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। हाल ही में नगर पालिकाओं और पंचायतों में हुए सभासदों के मनोनयन में भाजपा ने जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग का परिचय दिया है, वह विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है। भाजपा साल भर चुनावी मोड में रहने वाली पार्टी के रूप में अपनी धाक जमाए हुए है। वहीं, दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की शांति के पीछे उसका सेफ वोटबैंक माना जा रहा है। बदायूं का जातीय समीकरण सपा की सबसे बड़ी ताकत है। जिले में लगभग 50 प्रतिशत आबादी यादव और मुस्लिम मतदाताओं की है। हालांकि विधानसभा वार इन आंकड़ों में फेरबदल संभव है, लेकिन यह ठोस आधार सपा को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त देता है। यही कारण है कि सपा के जमीनी संगठन की हलचल कम होने के बावजूद, टिकट के दावेदार व्यक्तिगत स्तर पर जनता के बीच सक्रिय हैं।

भाजपा इस समय उन जातियों को साधने में जुटी है, जो अब तक सपा के पाले में रही हैं या तटस्थ रही हैं। भाजपा की ताकत उसका मजबूत पन्ना प्रमुख ढांचा है, जबकि सपा का भरोसा अपने पारंपरिक गढ़ को बचाए रखने पर है। कांग्रेस की स्थिति फिलहाल जिले में नगण्य दिखाई दे रही है। अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा की संगठनात्मक मेहनत सपा के जातीय तिलिस्म को तोड़ पाएगी, या फिर बदायूं की जनता एक बार फिर पुराने समीकरणों पर ही मोहर लगाएगी। चुनाव की रणभेरी बजने से पहले ही बदायूं की बिसात बिछ चुकी है।

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